30 July, 2012

प्रयास-15

अपने जज़बात को, नज़रों से, सुना देते हैं,
इस तरह दिल से, हम दिल को, मिला लेते हैं।

दिल के बाज़ार में, किस तरह, पुकारें तुझको,
उठ के झुकती हुई, नज़रों से सदा देते हैं।

जलते रहते हैं, सरे राह, पतंगों की तरह,
इश्क़ की शम्मा को, हम दिल में जला लेते हैं।

न दें तस्वीर, ज़माने को, वो है पर्दानशीं,
उस बुत-ए-हुस्न को, आंखों में छुपा लेते हैं।

दूर रहते हैं, अगर तुझसे तो, ऐ जानेवफ़ा,
तेरी यादों का ही, इक दीप जला लेते हैं,
अपने जज़बात को, नज़रों से, सुना देते हैं,
इस तरह दिल से, हम दिल को मिला, लेते हैं।
(सदा = आवाज लगाना / पुकार)
-          दीपक शिरहट्टी, 30/07/2012

26 July, 2012

प्रयास-14


कभी हंसाती तो कभी रुलाती है,
दुनिया की रंगीनियां, रोज़ नये करतब दिखाती है,
सम्भल के चलना इस राह पर, ऐ दोस्त,
ज़िन्दगी के सफ़र को दुनिया, बाज़ार बनाती है।

तेरी ख़ुशी, तेरा ग़म, सब बिकता है यहां,
तेरा नाज़, तेरा अन्दाज़, कुछ नही टिकता यहां,
पैसे के दम पे, तुझ पर राज चलाती है,
ज़िन्दगी के सफ़र को दुनिया, बाज़ार बनाती है।

तेरी सफलता, कुछ पलों की कहानी है,
तेरा ग़म भी वक्त की रवानी है,
हर पल ये कुछ नया ढूंढ कर दिखाती है,
ज़िन्दगी के सफ़र को दुनिया, बाज़ार बनाती है।

तू और तेरे अपने? किस ख्वाब में जी रहा है,
क्यूं छलावे के ज़हर को, जाम की तरह पी रहा है,
एक झटके से, ये तेरा सब कुछ मिटाती है,
ज़िन्दगी के सफ़र को दुनिया, बाज़ार बनाती है।

- दीपक शिरहट्टी, 23/07/2012