16 August, 2013

प्रयास-20


(20)

कहां जा रही है तू, ठहर, तुझे जी तो लूं पहले,

ऐ ज़िन्दगी ज़रा रुक,

आ मेरे साथ, इस बाग़ में, ज़रा मिल कर टहलें।

 

इस बाग में मेरे बचपन की हैं यादें बिखरी,

तब बहुत छोटा था यह बाग़,

जहां यारों खिलौनों के साथ दिन,

और मां के साथ मेरी रातें निखरी,

छोटी छोटी ज़िद,

छोटे छोटे वादों से ही मन बहले,

ऐ ज़िन्दगी ज़रा रुक,

आ मेरे साथ, इस बाग़ में, ज़रा मिल कर टहलें।

 

 

समय के साथ सीखने सिखाने की बात आई,

कुछ लड़कपन, कुछ समझदारी

और कुछ दुनियादारी की आहट लाई,

दोस्ती की प्यारी भाषा

और मन की सुनहरी आशा के साथ

कदम कुछ ठिठके कुछ सम्भले,

ऐ ज़िन्दगी ज़रा रुक,

आ मेरे साथ, इस बाग़ में, ज़रा मिल कर टहलें।

 

 

जवाबदारी का फिर एक नया दौर चालू हुआ,

पहले नौकरी, फिर शादी और फिर

सन्तानों का साथ हुआ,

दोस्तों का साथ छूटता गया

और जवाबदारियों में ही दिन निकले,

ऐ ज़िन्दगी ज़रा रुक,

आ मेरे साथ, इस बाग़ में, ज़रा मिल कर टहलें।

 

अब, ज़रा रुक के इस बाग को देखता हूं,

अपने अनुभवों को तटस्थ भाव से देखता हूं,

इस बाग़ में सभी तो रंग हैं,

कुछ कांटे तो हैं

पर अधिकतर फूलों का संग है,

उम्र के इस मध्य पड़ाव में

अपने मन की बात तो कह लें,

ऐ ज़िन्दगी ज़रा रुक,

आ मेरे साथ, इस बाग़ में, ज़रा मिल कर टहलें।

 

 

क्या खोया, क्या पाया का हिसाब करना व्यर्थ है,

अपने जीवन की, किसी और से तुलना करने का भी क्या अर्थ है

जो किया अच्छा किया

जो हुआ अच्छा हुआ

यही मान कर, पुनः अपने कर्तव्य पथ पर निकलें

ऐ ज़िन्दगी ज़रा रुक,

आ मेरे साथ, इस बाग़ में, ज़रा मिल कर टहलें।

 

 

जो छूटा है, उसे साथ लेने का प्रयास करें

जिसे दुखाया है, उसे साध लेने का प्रयास करें

जब ज़िन्दगी का साथ छूट जायेगा

तब मैं नही

बस, मेरा कर्म ही बाकी रह पायेगा

अपनी इसी विरासत की

लम्बी आयु के लिये कुछ प्रयत्न कर लें

ऐ ज़िन्दगी ज़रा रुक,

आ मेरे साथ, इस बाग़ में, ज़रा मिल कर टहलें।

 

-          दीपक शिरहट्टी,
17/06/2013 – 16/08/2013

17 June, 2013

प्रयास-19


(19)

काले घने मेघ, शाम से बरसा रहे थे जल,

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 

क्या धरती का रूखापन मिट जाएगा

क्या वृक्षों को नया जीवन मिल पाएगा

क्या खेतों में फिर से चलने लगेंगे हल,

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 

क्या प्यासे जीवन की प्यास बुझ जाएगी

क्या लोगों की आस फिर जाग जाएगी

क्या नई हरियाली के साथ आयेगा मस्ती का पल

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 

क्या मनुष्यता को भी मिलेगा नया जीवन

क्या मानव मन से हटेगी द्वेष की सीलन

क्या देश में प्रेम की ज्योत फिर जाएगी जल

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 

काले घने मेघ, शाम से बरसा रहे थे जल,

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 
- दीपक शिरहट्टी, 17/06/2013

30 April, 2013

प्रयास-18


(18)

तेरे जलवों के चर्चे बिखरे हैं फ़िज़ाओं में,
कद्रदां हो न हो कोई, ख़रीदार तो बहुत हैं। 

जाने क्यों जलता है दिल तेरे वास्ते मुहब्बत,
वजह हो न हो कोई, अरमां तो बहुत हैं।

 जीस्त की राहों पर चलता हूं मुसलसल,
दिया हो न हो कोई, सितारे तो बहुत हैं। 

तूफ़ान की लहरों से लड़ रही हैं किश्तियां,
सहारा हो न हो कोई, किनारे तो बहुत हैं।

 खाकसार को दुश्मनों की क्या कमी "दीपक",
बाहर हो न हो कोई, दिले नासाज़ बहुत है।

(जीस्त = जीवन, मुसलसल = बिना रुके / लगातार)

-          दीपक शिरहट्टी, 29/04/2013

20 February, 2013

प्रयास-17


(17)

इश्क की बारिशों में, डूब कर, समझो इशारा,
इस महकती शाम में, तुझको पुकारे, दिल हमारा।

हवाओं में है ठण्डक, दिल में है, गर्मी की धड़कन,
के सांसों में है महका, गुल तुम्हारा।
इस महकती शाम में, तुझको पुकारे, दिल हमारा,
इश्क की बारिशों में, डूब कर, समझो इशारा।

फिज़ां के भेस में, बिखरे, तेरी ज़ुल्फों के साये,
के लालिमा में है, बिखरा, खूं हमारा।
इस महकती शाम में, तुझको पुकारे, दिल हमारा,
इश्क की बारिशों में, डूब कर, समझो इशारा।

आ भी जा अब के, दिल में, प्यार के, उठते हैं शोले,
के शोलों में है, जलता, मन हमारा।
इश्क की बारिशों में, डूब कर, समझो इशारा,
इस महकती शाम में, तुझको पुकारे, दिल हमारा।

- दीपक शिरहट्टी, 20/02/2013

16 January, 2013

प्रयास-16


(16)

सफलता को सिर न चढ़ाओ, असफलता से न घबराओ,
सर्वस्व उसी को अर्पण करो और जो हो गया उसे बिसराओ।

समय किसी के लिये नही रुकता,
जीवन किसी के साधे नही सधता,
दुःख की काली रात भी बीत जाएगी,
सूर्य निकलेगा, न घबराओ,
सर्वस्व उसी को अर्पण करो और जो हो गया उसे बिसराओ।

अपनों की उपेक्षा से दुःख मिलेगा,
अपनों से अपेक्षा में भी दुःख मिलेगा,
अपने कर्तव्यों का ध्यान करो,
कर्म करो, न डगमगाओ,
सर्वस्व उसी को अर्पण करो और जो हो गया उसे बिसराओ।

सुख और दुःख, दोनो क्षणिक होते हैं,
अपने कर्मों को ही हम, भविष्य के लिये बोते हैं,
जो मिले, निरपेक्षता से अपनाओ,
सर्वस्व उसी को अर्पण करो और जो हो गया उसे बिसराओ।

- दीपक शिरहट्टी, 16/01/2013