21 March, 2012

प्रयास-12

जा अब दोस्तों के साथ,
खेल मस्ती से होली,
क्यों टेंशन लेता है इतना,
जो होनी थी सो हो-ली।

भगवान को कर रंग अर्पण,
माता-पिता और बुजुर्गों को तिलक लगा,
उनका आशीर्वाद ले और,
परिवार में आनन्द जगा,
फिर चुपके से कर,
प्रियतम के संग ठिठोली,
अब बस भी कर ले मितरा,
जो होनी थी सो हो-ली।

लड्डू चिवड़े का आनन्द,
भांग के भजियों की गन्ध,
होलिका को पूरण का भोग
और खुद के लिये पूरण पोली,
अरे क्यों टेंशन लेता है प्यारे,
जो होनी थी सो हो-ली।

देख कौन कौन दोस्त आया है,
लाल, पीले और हरे रंग लाया है,
अब तू भी निकल,
बना दोस्तों की टोली,
अब फायनली उठ जा पापे,
जो होनी थी सो हो-ली।

- दीपक शिरहट्टी, 06/03/2012

प्रयास-11

ऐ मेरे मन, बता तू क्या चाहता है,
क्यों हासिल खुशियों को छोड़, सपनों के पीछे भागता है,
माना कि सपने होते हैं ज़रूरी, जीने के लिये,
पर क्यों कल के लिये, आज के आनन्द को टालता है।

देख तेरे आज में कितना सुख धरा है,
तेरा पूरा संसार छोटी – छोटी ख़ुशियों से भरा है,
भर ले अपनी मुट्ठी में ओस के ये मोती,
बहता पानी तो किसी बन्धन को नही मानता है,
माना कि सपने होते हैं ज़रूरी, जीने के लिये,
पर क्यों कल के लिये, आज के आनन्द को टालता है।


बड़ी चाहतों की चाह में,
दुनिया की विविधताओं से भरी राह में,
मंज़िल पाने कि कोशिशों में,
तू क्यों रास्ते की सुन्दरता को कम आंकता है,
माना कि सपने होते हैं ज़रूरी, जीने के लिये,
पर क्यों कल के लिये, आज के आनन्द को टालता है।


रौशनी की चकाचौन्ध में तू दीवाना हो रहा है,
भौतिकता की दौड़ में अपनों से बेगाना हो रहा है,
पर शाम के धुंधलके में जुगनुओं का टिमटिमाना ही,
ऐ मन, क्यों तुझे, मुझ से बांधता है,
माना कि सपने होते हैं ज़रूरी, जीने के लिये,
पर क्यों कल के लिये, आज के आनन्द को टालता है।

- दीपक शिरहट्टी, 03/03/2012

प्रयास-10

कफ़न को सर पे बान्ध कर, तिलक लगा के लढ़ गये,
स्वतंत्रता की राह में हजारों सर थे कट गये।

वो लौह सा प्रताप था, वो अग्नि सा था इक शिवा,
था धैर्यवान छत्रसाल और नीतिवान पेशवा,
विदेशियों के आक्रमण की धार कुन्द कर गये,
स्वतंत्रता की राह में हजारों सर थे कट गये।

कुर्बानियां गुरु तेग की, ललकार गुरु गोविन्द की,
इक आग सी झांसी की थी, वीरांगना कित्तूर की,
इस मां के लाल नौंजवां सर्वस्व होम कर गये,
स्वतंत्रता की राह में हजारों सर थे कट गये।

अशफ़ाक, भगत, राज ने दी आहुतियां जान की,
बिखरा गये थे देश में वो रौशनियां शान की,
आज़ाद हिन्द फौज के मोती सभी बिखर गये,
स्वतंत्रता की राह में हजारों सर थे कट गये।

स्वतंत्रता के मोल को तुम भारतीयों जान लो,
बुराई को तुम छोड़ दो और भ्रष्टचार ना करो,
इस राष्ट्र के विकास की तुम बागडोर थाम लो,
तन-मन लगा के देश में तुम स्वर्ग को उतार लो,
तुम अल्पकाल में ही क्या इस बात को बिसर गये ?
स्वतंत्रता की राह में, हजारों सर थे कट गये।

- दीपक शिरहट्टी, 14/07/2011

प्रयास-9

इस नील गगन विस्तार अनन्त में, रूप तुम्हारा पाता हूं,
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।

जब भी मन की आंखें खोलीं, जब भी मन से आवाज़ दिया,
तुम आये तो चुपचाप, मगर जीवन को मेरे तार दिया,
मैं हूं क्षुद्रक, मैं हूं भंगुर, पर प्यार तुम्हारा पाता हूं,
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।

हो हर क्षण को तुम साथ मेरे, इन सांसों में, इस धड़कन में,
हर राह में हो तुम संग चले, हर अंधियारे में दीप बने,
हैं रूप अनन्त तुम्हारे, प्रभु हर ओर मैं तुमको पाता हूं,
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।

जीवन की भूल-भुलैया में, हो ध्येय तुम्ही और राह भी तुम,
तुम ही अन्तिम, तुम ही आदि, इस राह के हर इक मोड़ भी तुम,
है जीवन-पथ पर साथ तुम्हारा, स्वर्ग यहीं पर पाता हूं
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।

इस नील गगन विस्तार अनन्त में, रूप तुम्हारा पाता हूं,
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।

- दीपक शिरहट्टी, 26/11/2010

प्रयास-8

चांद के पीछे पड़े थे तुम, तो हमसे क्यों गिला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

पहले भी तो तुमको मेरी, बन्दगी दरकार थी,
मेरी बातों से तुम्हारी, ज़िन्दगी गुलज़ार थी,
अबके ये मौसम सुहाना, दर्द दे कर क्यों चला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

ग़र तुम्हे थी चाहिये, संसार की रानाइयां,
हमसे कहते, क्यों करी तुमने फकत रुसवाइयां,
हम भी कर देते, तुम्हे रौशन, जिगर को ख़ुद जला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

जाते जाते तुम हमारा, नाम रुसवा, कर गये,
जो नही हमने किया, उसका भी, शिकवा कर गये,
प्यार का मेरे, यूं तुमने, क्यों दिया है ये सिला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

चांद के पीछे पड़े थे तुम, तो हमसे क्यों गिला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

- दीपक शिरहट्टी, 30/08/2010

प्रयास-7

हो रही बारिश, सुहानी शाम घिर के आ रही,
सूर्य भी शरमा रहा, काली घटाएं छा रही,
पंछियों ने नीड़ में आश्रय लिया, सब छोड़ के,
हमपे भी इस शाम की थोड़ी खुमारी छा रही।

सोचता हूं, भीगते ही बाग़ में बैठा रहूं,
या के फिर, परिवार के संग लॉन्ग ड्राइव पे चलूं,
चाय के संग प्लेट भजियों की मंगाई जा रही,
हमपे भी इस शाम की थोड़ी खुमारी छा रही।

बात जब घर मे चलाई, इन विकल्पों के लिये,
लग गये सब सोचने अपने जवाबों के लिये,
उठ के फिर से बीच में टी.व्ही. की बातें आ रही,
हमपे भी इस शाम की थोड़ी खुमारी छा रही।

बच्चियों का मूड ठण्डा, आई भी राज़ी नहीं,
कोई भी घर छोड़ के, यूं घूमने जाये नहीं,
अंजली भी फ़िल्म देखे, टी.व्ही. पे जो आ रही,
हमपे अब इस शाम की कोई खुमारी ना रही।

- दीपक शिरहट्टी, 12/07/2010

प्रयास-6

फिर से आया आज सावन, इन घटाओं को लिये,
फिर से झूमी आज धरती, मस्त बून्दों के तले,
फिर से गूंजे पंछियों के, स्वर अदाओं से भरे,
तुम भी निकलो आज मानव, मन में आशाएं भरे।

बात कल की छोड़ दो, भूले बिसरने के लिये,
हर नया दिन ज़िन्दगी में, है संवरने के लिये,
गिर पड़ीं पतियां ये सूखीं, वृक्ष हो रहे हैं हरे,
तुम भी निकलो आज मानव, मन में आशाएं भरे।

प्रकृति के इस सृजन को, आज तुम पहचान लो,
ख़ाक से ही खिल रही रंगीनियां, तुम जान लो,
आसमां को भी झुका दो, हों कदम हिम्मत भरे,
तुम भी निकलो आज मानव, मन में आशाएं भरे।

- दीपक शिरहट्टी, 09/07/2010

प्रयास-5

चलते चलते राह में यूं हीं कभी रुक जाता हूं,
थोड़ा अलसाते, थोड़ा सुस्ताते, बीते पलों को सहलाता हूं।

देखता हूं पल ग़ुज़रते, याद करता हूं तुझे,
तुम ही तो थीं साथ मेरे, जब ज़रूरत थी मुझे,
मतलबी दुनिया में तुमको ही तो अपना पाता हूं,
थोड़ा अलसाते, थोड़ा सुस्ताते, बीते पलों को सहलाता हूं।

खिल रही हो धूप या फ़िर आंधियां हों चल रही,
या के हो काली घटाएं, बिजलियां हों गिर रही,
जो भी हो मौसम, तुम्हारे साथ में सह जाता हूं
थोड़ा अलसाते, थोड़ा सुस्ताते, बीते पलों को सहलाता हूं।

सोचता हूं किस तरह से शुक्रिया तुझको कहूं,
या के फ़िर मन की ये बातें अपने मन ही में रखूं,
तुम बुरा न मान जाओ, सोच कर डर जाता हूं,
थोड़ा अलसाते, थोड़ा सुस्ताते, बीते पलों को सहलाता हूं।

- दीपक शिरहट्टी, 08/07/2010

प्रयास-4

ये ज़िन्दगी इक राह है, इस राह में हम-तुम मिले
फ़िर फ़ासले यूं तय हुए, दिन पंछियों से उड़ चले।

तुम मुस्कुराती हो तो यूं लगता है जैसे महफ़िलें
रौशन हुईं और दीप ख़ुशियों के हज़ारों जल पड़े।

तुम पास हो रब साथ है, फ़िर ख़ौफ़ किसके वासते
हम बढ़ चले बिन्दास अपनी मंज़िलों से जा मिले।

ये मंज़िलें हैं ज़िन्दगी की आख़री सच्चाइयां
जों कड़कड़ाती धूप में हो नीम की परछाइयां
इस दौर में थे साथ हम-तुम ज़िन्दगी जीते हुए
उस दौर में भी ख़्वाहिशें हैं तुम से हम फ़िर से मिलें।

- दीपक शिरहट्टी

प्रयास-3

सर उठा कर चल पड़े हैं, ज़िन्दगी की रहग़ुज़र पर
जीत लेंगे हर वो बाजी, सत्य की सीधी डगर पर।

लोभ, मद और क्रोध तो दिखलाएंगे मंज़िल को पास
सत्य ही ले जायेगा, अन्त में हमें सुख के सफ़र पर।

दुश्मनों तुम पास रख लो भ्रष्ट अपने रास्-ते
जीत हमको ही मिलेगी, ईमान की इस राह पर।

झूठ वालों ये न सोचो डर के हम हट जाएंगे
हम ही लहराएंगे झंडा, इस हिमालय के शिखर पर।

- दीपक शिरहट्टी

प्रयास-2

बिछ गई ख़ुशियां हज़ारों, प्यार की इस राह में,
इक मुजस्सिम चांदनी थी, उस मचलती रात में।

चांद भी शरमा रहा था, चांदनी के नूर से,
शबनमों की तश्नगी थी, उस नशीली रात में।

जाने क्या क्या हो रहा था, इस धड़कते दिल में भी,
जाने कैसी सादगी थी, उनकी हर इक बात में।

हम ज़माने की जफाओं से न अब घबराएंगे,
ख़ुशबुएं हैं उनकी अब तो, मेरी हर इक सांस में।

- दीपक शिरहट्टी
(मुजस्सिम – अध्यात्मिक, तश्नगी – प्यास)

प्रयास-1

तेरी आंखें खुली क़िताबों सी,
क्यूं न पढ़ लें लिखा हुआ हम भी ।

ये जो खुलती हैं नूर बहता है,
बन्द हो जब, लगें किनारों सी।

ज़रा ठहरो भी, मैं सुनू कैसे,
बात करती हैं ये इशारों सी।

मय की बातें करें जो लोग, झूठे हैं,
पाक़ हैं ये तो आब-ओ गंगा सी।
- दीपक शिरहट्टी
(नूर – प्रकाश, मय – शराब, पाक़ – पवित्र, आब - पानी)

कुछ कही

2007 में शुरू किया यह ब्लॉग अभी तक सूना ही पड़ा था। बहुत सोचा पर लिखने के लिये मन में कुछ ठोस नही था। फिर कविताएं लिखना शुरू किया और फेसबुक पर रखते गया। मित्रों का अच्छा प्रतिसाद मिला। अब सोचता हूं उन कविताओं को यहां भी रखूं। इसी बहाने इस ब्लॉग का सूनापन कुछ दूर होगा।