26 July, 2012

प्रयास-14


कभी हंसाती तो कभी रुलाती है,
दुनिया की रंगीनियां, रोज़ नये करतब दिखाती है,
सम्भल के चलना इस राह पर, ऐ दोस्त,
ज़िन्दगी के सफ़र को दुनिया, बाज़ार बनाती है।

तेरी ख़ुशी, तेरा ग़म, सब बिकता है यहां,
तेरा नाज़, तेरा अन्दाज़, कुछ नही टिकता यहां,
पैसे के दम पे, तुझ पर राज चलाती है,
ज़िन्दगी के सफ़र को दुनिया, बाज़ार बनाती है।

तेरी सफलता, कुछ पलों की कहानी है,
तेरा ग़म भी वक्त की रवानी है,
हर पल ये कुछ नया ढूंढ कर दिखाती है,
ज़िन्दगी के सफ़र को दुनिया, बाज़ार बनाती है।

तू और तेरे अपने? किस ख्वाब में जी रहा है,
क्यूं छलावे के ज़हर को, जाम की तरह पी रहा है,
एक झटके से, ये तेरा सब कुछ मिटाती है,
ज़िन्दगी के सफ़र को दुनिया, बाज़ार बनाती है।

- दीपक शिरहट्टी, 23/07/2012

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