30 July, 2012

प्रयास-15

अपने जज़बात को, नज़रों से, सुना देते हैं,
इस तरह दिल से, हम दिल को, मिला लेते हैं।

दिल के बाज़ार में, किस तरह, पुकारें तुझको,
उठ के झुकती हुई, नज़रों से सदा देते हैं।

जलते रहते हैं, सरे राह, पतंगों की तरह,
इश्क़ की शम्मा को, हम दिल में जला लेते हैं।

न दें तस्वीर, ज़माने को, वो है पर्दानशीं,
उस बुत-ए-हुस्न को, आंखों में छुपा लेते हैं।

दूर रहते हैं, अगर तुझसे तो, ऐ जानेवफ़ा,
तेरी यादों का ही, इक दीप जला लेते हैं,
अपने जज़बात को, नज़रों से, सुना देते हैं,
इस तरह दिल से, हम दिल को मिला, लेते हैं।
(सदा = आवाज लगाना / पुकार)
-          दीपक शिरहट्टी, 30/07/2012

1 comment:

Shubhangee said...

बहुत अच्छा। भगवद् गीता का तत्त्वज्ञान आपने सिधे और सरलतासे बताया है, सरलता से लिखना कठिन है और उससे मुश्किल है आचरन !