30 April, 2013

प्रयास-18


(18)

तेरे जलवों के चर्चे बिखरे हैं फ़िज़ाओं में,
कद्रदां हो न हो कोई, ख़रीदार तो बहुत हैं। 

जाने क्यों जलता है दिल तेरे वास्ते मुहब्बत,
वजह हो न हो कोई, अरमां तो बहुत हैं।

 जीस्त की राहों पर चलता हूं मुसलसल,
दिया हो न हो कोई, सितारे तो बहुत हैं। 

तूफ़ान की लहरों से लड़ रही हैं किश्तियां,
सहारा हो न हो कोई, किनारे तो बहुत हैं।

 खाकसार को दुश्मनों की क्या कमी "दीपक",
बाहर हो न हो कोई, दिले नासाज़ बहुत है।

(जीस्त = जीवन, मुसलसल = बिना रुके / लगातार)

-          दीपक शिरहट्टी, 29/04/2013

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