(18)
तेरे जलवों के चर्चे
बिखरे हैं फ़िज़ाओं में,
कद्रदां हो न हो
कोई, ख़रीदार तो बहुत हैं।
जाने क्यों जलता है
दिल तेरे वास्ते मुहब्बत,
वजह हो न हो कोई, अरमां
तो बहुत हैं।
दिया हो न हो कोई,
सितारे तो बहुत हैं।
तूफ़ान की लहरों से
लड़ रही हैं किश्तियां,
सहारा हो न हो कोई,
किनारे तो बहुत हैं।
बाहर हो न हो कोई, दिले नासाज़ बहुत है।
(जीस्त = जीवन, मुसलसल = बिना रुके / लगातार)
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दीपक शिरहट्टी,
29/04/2013
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