17 June, 2013

प्रयास-19


(19)

काले घने मेघ, शाम से बरसा रहे थे जल,

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 

क्या धरती का रूखापन मिट जाएगा

क्या वृक्षों को नया जीवन मिल पाएगा

क्या खेतों में फिर से चलने लगेंगे हल,

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 

क्या प्यासे जीवन की प्यास बुझ जाएगी

क्या लोगों की आस फिर जाग जाएगी

क्या नई हरियाली के साथ आयेगा मस्ती का पल

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 

क्या मनुष्यता को भी मिलेगा नया जीवन

क्या मानव मन से हटेगी द्वेष की सीलन

क्या देश में प्रेम की ज्योत फिर जाएगी जल

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 

काले घने मेघ, शाम से बरसा रहे थे जल,

मैं सोच रहा था, आनन्दित हो, कैसा होगा कल।

 
- दीपक शिरहट्टी, 17/06/2013

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