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मतलबी दुनिया में
अभी भी सच्चे हैं
रंगबिरंगे सदाबहार
फूलों के गुच्छे हैं
क्या सुनाऊं दुनिया
को मेरे मित्रों के किस्से
पचास के हो गये पर
अभी भी बच्चे हैं।
चिन्ता शरीर की और
सर भी तो गंजे हैं,
हाथ पांव लुंज पुंज
और ढीले हो रहे पंजे हैं
क्या सुनाऊं दुनिया
को मेरे मित्रों के किस्से
पचास के हो गये पर
अभी भी बच्चे हैं।
दूसरों को ज्ञान दें
पर आपस में टुच्चे हैं
प्यार से झगड़ते
हैं, बहुत ही लुच्चे हैं
क्या सुनाऊं दुनिया
को मेरे मित्रों के किस्से
पचास के हो गये पर
अभी भी बच्चे हैं।
घरवालों से झूट बोल,
देते वो गच्चे हैं
आपस में मिलने के
लिये, करते मगज पच्चे हैं
क्या सुनाऊं दुनिया
को मेरे मित्रों के किस्से
पचास के हो गये पर
अभी भी बच्चे हैं।
- दीपक शिरहट्टी, 28/06/2016
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