तेरी आंखें खुली क़िताबों सी,
क्यूं न पढ़ लें लिखा हुआ हम भी ।
ये जो खुलती हैं नूर बहता है,
बन्द हो जब, लगें किनारों सी।
ज़रा ठहरो भी, मैं सुनू कैसे,
बात करती हैं ये इशारों सी।
मय की बातें करें जो लोग, झूठे हैं,
पाक़ हैं ये तो आब-ओ गंगा सी।
- दीपक शिरहट्टी
(नूर – प्रकाश, मय – शराब, पाक़ – पवित्र, आब - पानी)
क्यूं न पढ़ लें लिखा हुआ हम भी ।
ये जो खुलती हैं नूर बहता है,
बन्द हो जब, लगें किनारों सी।
ज़रा ठहरो भी, मैं सुनू कैसे,
बात करती हैं ये इशारों सी।
मय की बातें करें जो लोग, झूठे हैं,
पाक़ हैं ये तो आब-ओ गंगा सी।
- दीपक शिरहट्टी
(नूर – प्रकाश, मय – शराब, पाक़ – पवित्र, आब - पानी)
No comments:
Post a Comment