21 March, 2012

प्रयास-4

ये ज़िन्दगी इक राह है, इस राह में हम-तुम मिले
फ़िर फ़ासले यूं तय हुए, दिन पंछियों से उड़ चले।

तुम मुस्कुराती हो तो यूं लगता है जैसे महफ़िलें
रौशन हुईं और दीप ख़ुशियों के हज़ारों जल पड़े।

तुम पास हो रब साथ है, फ़िर ख़ौफ़ किसके वासते
हम बढ़ चले बिन्दास अपनी मंज़िलों से जा मिले।

ये मंज़िलें हैं ज़िन्दगी की आख़री सच्चाइयां
जों कड़कड़ाती धूप में हो नीम की परछाइयां
इस दौर में थे साथ हम-तुम ज़िन्दगी जीते हुए
उस दौर में भी ख़्वाहिशें हैं तुम से हम फ़िर से मिलें।

- दीपक शिरहट्टी

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