21 March, 2012

प्रयास-10

कफ़न को सर पे बान्ध कर, तिलक लगा के लढ़ गये,
स्वतंत्रता की राह में हजारों सर थे कट गये।

वो लौह सा प्रताप था, वो अग्नि सा था इक शिवा,
था धैर्यवान छत्रसाल और नीतिवान पेशवा,
विदेशियों के आक्रमण की धार कुन्द कर गये,
स्वतंत्रता की राह में हजारों सर थे कट गये।

कुर्बानियां गुरु तेग की, ललकार गुरु गोविन्द की,
इक आग सी झांसी की थी, वीरांगना कित्तूर की,
इस मां के लाल नौंजवां सर्वस्व होम कर गये,
स्वतंत्रता की राह में हजारों सर थे कट गये।

अशफ़ाक, भगत, राज ने दी आहुतियां जान की,
बिखरा गये थे देश में वो रौशनियां शान की,
आज़ाद हिन्द फौज के मोती सभी बिखर गये,
स्वतंत्रता की राह में हजारों सर थे कट गये।

स्वतंत्रता के मोल को तुम भारतीयों जान लो,
बुराई को तुम छोड़ दो और भ्रष्टचार ना करो,
इस राष्ट्र के विकास की तुम बागडोर थाम लो,
तन-मन लगा के देश में तुम स्वर्ग को उतार लो,
तुम अल्पकाल में ही क्या इस बात को बिसर गये ?
स्वतंत्रता की राह में, हजारों सर थे कट गये।

- दीपक शिरहट्टी, 14/07/2011

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