21 March, 2012

प्रयास-5

चलते चलते राह में यूं हीं कभी रुक जाता हूं,
थोड़ा अलसाते, थोड़ा सुस्ताते, बीते पलों को सहलाता हूं।

देखता हूं पल ग़ुज़रते, याद करता हूं तुझे,
तुम ही तो थीं साथ मेरे, जब ज़रूरत थी मुझे,
मतलबी दुनिया में तुमको ही तो अपना पाता हूं,
थोड़ा अलसाते, थोड़ा सुस्ताते, बीते पलों को सहलाता हूं।

खिल रही हो धूप या फ़िर आंधियां हों चल रही,
या के हो काली घटाएं, बिजलियां हों गिर रही,
जो भी हो मौसम, तुम्हारे साथ में सह जाता हूं
थोड़ा अलसाते, थोड़ा सुस्ताते, बीते पलों को सहलाता हूं।

सोचता हूं किस तरह से शुक्रिया तुझको कहूं,
या के फ़िर मन की ये बातें अपने मन ही में रखूं,
तुम बुरा न मान जाओ, सोच कर डर जाता हूं,
थोड़ा अलसाते, थोड़ा सुस्ताते, बीते पलों को सहलाता हूं।

- दीपक शिरहट्टी, 08/07/2010

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