इस नील गगन विस्तार अनन्त में, रूप तुम्हारा पाता हूं,
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।
जब भी मन की आंखें खोलीं, जब भी मन से आवाज़ दिया,
तुम आये तो चुपचाप, मगर जीवन को मेरे तार दिया,
मैं हूं क्षुद्रक, मैं हूं भंगुर, पर प्यार तुम्हारा पाता हूं,
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।
हो हर क्षण को तुम साथ मेरे, इन सांसों में, इस धड़कन में,
हर राह में हो तुम संग चले, हर अंधियारे में दीप बने,
हैं रूप अनन्त तुम्हारे, प्रभु हर ओर मैं तुमको पाता हूं,
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।
जीवन की भूल-भुलैया में, हो ध्येय तुम्ही और राह भी तुम,
तुम ही अन्तिम, तुम ही आदि, इस राह के हर इक मोड़ भी तुम,
है जीवन-पथ पर साथ तुम्हारा, स्वर्ग यहीं पर पाता हूं
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।
इस नील गगन विस्तार अनन्त में, रूप तुम्हारा पाता हूं,
हूं अंश तुम्हारा दुनिया में, और द्वार तुम्ही के आता हूं।
- दीपक शिरहट्टी, 26/11/2010
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