फिर से आया आज सावन, इन घटाओं को लिये,
फिर से झूमी आज धरती, मस्त बून्दों के तले,
फिर से गूंजे पंछियों के, स्वर अदाओं से भरे,
तुम भी निकलो आज मानव, मन में आशाएं भरे।
बात कल की छोड़ दो, भूले बिसरने के लिये,
हर नया दिन ज़िन्दगी में, है संवरने के लिये,
गिर पड़ीं पतियां ये सूखीं, वृक्ष हो रहे हैं हरे,
तुम भी निकलो आज मानव, मन में आशाएं भरे।
प्रकृति के इस सृजन को, आज तुम पहचान लो,
ख़ाक से ही खिल रही रंगीनियां, तुम जान लो,
आसमां को भी झुका दो, हों कदम हिम्मत भरे,
तुम भी निकलो आज मानव, मन में आशाएं भरे।
- दीपक शिरहट्टी, 09/07/2010
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