21 March, 2012

प्रयास-8

चांद के पीछे पड़े थे तुम, तो हमसे क्यों गिला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

पहले भी तो तुमको मेरी, बन्दगी दरकार थी,
मेरी बातों से तुम्हारी, ज़िन्दगी गुलज़ार थी,
अबके ये मौसम सुहाना, दर्द दे कर क्यों चला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

ग़र तुम्हे थी चाहिये, संसार की रानाइयां,
हमसे कहते, क्यों करी तुमने फकत रुसवाइयां,
हम भी कर देते, तुम्हे रौशन, जिगर को ख़ुद जला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

जाते जाते तुम हमारा, नाम रुसवा, कर गये,
जो नही हमने किया, उसका भी, शिकवा कर गये,
प्यार का मेरे, यूं तुमने, क्यों दिया है ये सिला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

चांद के पीछे पड़े थे तुम, तो हमसे क्यों गिला,
हम तुम्हारे थे, तुम्हे हमसे बिछड़ के, क्या मिला।

- दीपक शिरहट्टी, 30/08/2010

3 comments:

Sagar said...

Sir
this is ur best ever posted poem. touched to heart.

Shubhangee said...

really very touching poem !

Shubhangee said...

really very touching poem !